क्या मैं आज मिसफिट हूँ #newIndia में ?

BY :- Dr. Jawahar Surisetti , Futurist

यह सवाल बार-बार मेरे ज़हन में आता रहता है। मैंने जो कुछ भी हासिल किया है और जिसे गूगल पर मेरे नाम के सर्च से मापा जा सकता है, मैं अभी भी खुद को सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं पाता हूं। हाल की एक घटना ने मुझे इस लेख को लिखने के लिए मजबूर किया ।

अपनी यात्रा के दौरान, मैं एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल से मिला और मुझे लगता है कि उन्हें मेरे बारे में जानकारी दे दी गई थी

इसलिए वे मुझसे मिलने का इंतजार कर रहे थे। लेकिन जैसे ही हम मिले और मुझे उनसे परिचय कराया गया, सदस्यों में से एक ने मुझे ऊपर से नीचे तक मापा जैसे कि वह विश्वास नहीं कर सकता था कि मैं वही व्यक्ति था जिससे वे मिलने वाले थे। मैं समझ सकता हूं कि उन्होंने एक सूट बूट पहने व्यक्ति की कल्पना की होगी, लेकिन इसके बजाय एक कैज़ूअल कपड़े पहने एक सड़क छाप व्यक्ति मिला जिसकी दोनों जेब खचाखच भरे हुए सामान से उभरी हुई थीं  और एक साधारण राह चलते आदमी  की तस्वीर झलक रही थी। उनके चेहरे पर निराशा की झलक यह सब कह रही थी ।यह एक अलग बात है कि उन्होंने बाद में महसूस किया  की उनसे पहचानने  में त्रुटि हुई , लेकिन शुरुआती प्रतिक्रिया से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। और यह भारतीयों के लिए भी सच है।

मुझे एक बड़े समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था

जो लोग आयोजन कर रहे थे, उन्होंने प्रोफाइल पढ़ने के बाद एक अद्भुत व्यक्तित्व की कल्पना की। मुझे शाम 7 बजे वहाँ पहुँचना था और समय पर पहुँचने के हिसाब से मैंने अपने ड्राइवर को आधे घंटे पहले बुलाया था। मेरा ड्राइवर उस दिन देर से पहुँचा और मैंने देर होने पर अपना धैर्य खो दिया। मेरी दूसरी समस्या यह है कि मैं एक चार पहिया वाहन नहीं चलाता और ड्राइवर के न आने पर मैं फँस जाता हूँ। उन  ओला रहित दिनों में , गुस्से में मैंने अपनी स्कूटी ली और कार्यक्रम स्थल के लिए रवाना हो गया। अब, दो धारणाएं हैं जिन्हें हम मुख्य अतिथि की कल्पना करते समय आत्मसात करते हैं। पहला यह है कि उसे समय पर नहीं आना चाहिए क्योंकि हमारे भारतीय मानक समय के अनुसार शाम 7 बजे घोषित किया गया कार्यक्रम शाम 7.30 बजे से पहले शुरू नहीं होना चाहिए। और दूसरी धारणा यह है कि मुख्य अतिथि को एक चमचमाती कार में आना होता है, जो कार्यक्रम स्थल के द्वार पर रुकती है, कोई व्यक्ति दरवाजा खोलता है और वह स्वागत समिति की  गुलाबों से  स्वागत होता है, और उस व्यक्ति को अचरज भरी निगाहों से देखते हुए अंदर ले जाया जाता है। मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ और इसलिए आयोजकों के लिए निराशा का सबब बन  गया ।उनके निराशा का कारण, मुख्य अतिथि का एक दुपहिया वाहन पर आना , खुद वाहन पार्क करना और खुद को स्वागत समिति के सामने पेश  करना ।यहाँ मैं एक सस्पेन्स फिल्म  के बिगड़े क्लाइमैक्स की तरह  था जिससे उनका मज़ा किरकिरा हो गया।

ऐसे कई उदाहरण हैं जब मेरे ड्राइवर को मुझे समझकर स्वागत कर दिया गया क्योंकि वह मुझसे बेहतर कपड़े पहने हुए था । मैं इन घटनाओं को देखकर मुस्कुराता हूं मगर खुद को दुनिया के लिए बदलने से इनकार कर देता हूँ । मुझे लगता है कि मैं क्या पहनता हूं, मैं कैसा दिखता हूं और किस वाहन में आता हूं, बजाय   उसके मैं क्या हूं और मैं क्या काम करता हूं  उसपर  जो लोगों  के चेहरे के हावभाव बदलते हैं उसका मैं  आनंद लेता हूं क्योंकि मैं मूलतः एक मनोवैज्ञानिक हूं।

उस सवाल के लिए जो मैंने शीर्षक के रूप में उठाया है, “क्या मैं आज मिसफिट हूं? “ मैं देख रहा हूँ कि आज के युवा और परवाह नहीं करते हैं कि हम क्या पहनते हैं, हम कैसे दिखते हैं और यह सब। वे केवल इस बात में रुचि रखते हैं कि वे मुझ  क्या प्राप्त कर सकते हैं और यही मायने रखना चाहिए। रास्ता बदलने से मेरा इनकार है और मेरे बाह्य रूप से क़ीमत तय करने  वालों को  मैं तवज्जो नहीं दूँगा । हमारी आज तक की पीढ़ी अभी भी औपनिवेशिक सत्य में विश्वास करती है कि अच्छी तरह से तैयार होने वाले अंग्रेज़ों का हमारे भारतीयों की तुलना में ऊपरी हाथ है, इस तथ्य के बावजूद कि हमने इतना कुछ हासिल किया है। इसलिए जिस लगन और ईमानदारी के साथ मैं अपना काम करता हूं और जो नाम मैंने खुद के लिए बनाया है, मैं ऐसे किसी भी तरह के दिखावे से इनकार करता हूं  । यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अगर लोग मुझे और मेरे काम को पहचानते  हैं , तो इसका मतलब है कि मैं एक मिसफिट नहीं हूँ ।

यह #newindia है और यही नयी परिवर्तनशील सोच है जिसके लिए मुझे बनाया गया है